SCO समिट और मानसरोवर यात्रा पर फोकस... गलवान झड़प के बाद पहली बार चीन पहुंचे जयशंकर
SCO समिट और मानसरोवर यात्रा पर फोकस... गलवान झड़प के बाद पहली बार चीन पहुंचे जयशंकर
अनुरीत टाइम्स । नई दिल्ली।
भारत और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों में नया अध्याय जुड़ता दिख रहा है। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर पांच वर्षों के अंतराल के बाद चीन की यात्रा पर पहुंचे हैं। यह दौरा केवल एक कूटनीतिक शिष्टाचार भर नहीं, बल्कि दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी देशों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने की गंभीर कोशिश है। यह दौरा विशेष रूप से अहम इसलिए भी है क्योंकि यह 2020 की गलवान घाटी में हुए खूनी संघर्ष के बाद पहली उच्च स्तरीय भारतीय यात्रा है, जब दोनों देशों के जवानों के बीच हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। तब से सीमा विवाद और विश्वास का संकट दोनों ही चरम पर रहे हैं।
इस यात्रा का एक प्रमुख एजेंडा शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) के आगामी शिखर सम्मेलन में भारत की सक्रिय भूमिका को सुनिश्चित करना है। SCO जैसे बहुपक्षीय मंच पर भारत और चीन का साथ बैठना, बातचीत करना और रणनीतिक दिशा तय करना इस क्षेत्र में स्थिरता के लिहाज़ से निर्णायक हो सकता है। भारत इस मंच का उपयोग क्षेत्रीय आतंकवाद, व्यापारिक संतुलन और सुरक्षा सहयोग के मसलों पर स्पष्ट संदेश देने के लिए करता रहा है।
जयशंकर की यात्रा के दौरान मानसरोवर यात्रा मार्ग को पुनः शुरू करने पर भी विशेष चर्चा होने की संभावना है। कोरोना महामारी और सीमा विवाद के कारण पिछले कई वर्षों से कैलाश मानसरोवर यात्रा बाधित रही है। यह यात्रा हिंदुओं, बौद्धों और जैनों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यदि इस दिशा में कोई ठोस सहमति बनती है, तो यह न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होगा, बल्कि दोनों देशों के बीच ‘people-to-people connect’ को भी मजबूती देगा।
हालांकि भारत के लिए सबसे गंभीर चिंता का विषय चीन द्वारा पाकिस्तान को दिया जा रहा सैन्य समर्थन है। ड्रैगन के इस रुख को भारत अपनी सुरक्षा के लिए सीधा खतरा मानता है। हाल के दिनों में पाकिस्तान को दिए गए ड्रोन, मिसाइल तकनीक और लड़ाकू उपकरणों की आपूर्ति भारत की सीमा सुरक्षा नीति के खिलाफ जाती है। जयशंकर इस मुद्दे को चीन के समक्ष स्पष्ट रूप से उठाएंगे, और यह भी जताएंगे कि यदि बीजिंग को नई दिल्ली के साथ भरोसेमंद संबंध चाहिए, तो इस ‘दोहरी नीति’ को छोड़ना होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह यात्रा जहां एक ओर भारत की कूटनीतिक परिपक्वता का परिचायक है, वहीं चीन के लिए भी यह एक अवसर है कि वह दक्षिण एशिया में एक स्थायी भूमिका निभाने की जिम्मेदारी को गंभीरता से ले। भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह न तो दबाव में झुकने वाला देश है, और न ही आंख मूंदकर संबंध सुधारने वाला। शांति की राह तभी खुलेगी जब सीमा पर भरोसे और सम्मान की नींव मजबूत होगी।
जयशंकर की यह यात्रा उस पुराने पथ को फिर से खोजने की कोशिश है, जिस पर भारत और चीन कभी ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के साथ चले थे, लेकिन जिसे बाद में राजनीतिक स्वार्थों और सैन्य टकरावों ने धुंधला कर दिया। यह देखना अब बाकी है कि क्या बीजिंग इस अवसर का लाभ उठाएगा, या फिर एक और अवसर को खो देगा।
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