IVF-सरोगेसी घोटाला: 80 निःसंतान दंपतियों से ₹44 लाख की ठगी, डॉक्टर और उनकी टीम पर गंभीर आरोप
IVF-सरोगेसी घोटाला: 80 निःसंतान दंपतियों से ₹44 लाख की ठगी, डॉक्टर और उनकी टीम पर गंभीर आरोप
नई दिल्ली | 7 अगस्त 2025
निःसंतान दंपतियों की भावनाओं से खिलवाड़ करते हुए राजधानी में IVF और सरोगेसी से जुड़ा एक बड़ा धोखाधड़ी का मामला सामने आया है। इस मामले में एक निजी क्लिनिक के डॉक्टर और उनकी सहयोगी टीम पर आरोप है कि उन्होंने 80 से अधिक दंपतियों को संतान दिलाने का झांसा देकर उनसे करीब ₹44 लाख की मोटी रकम वसूली, और बाद में उन्हें फर्जी तरीके से दूसरों के नवजात शिशु सौंप दिए।
यह मामला न सिर्फ मेडिकल एथिक्स पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि निजी क्लीनिकों में कैसे कुछ लोग लोगों की मजबूरी और भावनाओं का शोषण कर रहे हैं।
घोटाले का खुलासा कैसे हुआ?
इस संगठित ठगी का पर्दाफाश तब हुआ जब एक पीड़ित दंपति ने डिलीवरी की अनुमानित तारीख को लेकर डॉक्टर से संपर्क किया। डॉक्टर ने पहले यह कहकर टाल दिया कि “बच्चे का जन्म अभी नहीं हुआ है”, लेकिन दंपति की बार-बार की पूछताछ पर जब स्पष्ट उत्तर नहीं मिला, तो उन्होंने अपनी स्तर पर जांच-पड़ताल शुरू की।
छानबीन में चौंकाने वाला सच सामने आया—डॉक्टर ने उनके नाम पर बच्चे को पहले ही किसी अन्य दंपति को सौंप दिया था। यह बात सामने आते ही अन्य पीड़ित भी सामने आने लगे, और धीरे-धीरे यह घोटाला उजागर हुआ।
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पुलिस ने क्या कार्रवाई की?
मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस ने प्राथमिक जांच शुरू कर दी। प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार:
डॉक्टर और क्लिनिक स्टाफ मिलकर एक संगठित गिरोह के रूप में काम कर रहे थे।
फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जिनमें ‘सरोगेट मां’ के नाम और मेडिकल डिटेल्स भी शामिल होती थीं।
बच्चों को गैरकानूनी तरीके से एक दंपति से लेकर दूसरे को सौंपा जाता था।
पूरे प्रकरण में कई बिचौलिए और निजी एजेंसियों की संलिप्तता की भी आशंका है।
पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि कई पीड़ितों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं और आरोपी डॉक्टर की गिरफ्तारी के लिए छापेमारी जारी है।
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सरकार की सख्त प्रतिक्रिया
राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है। स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट किया है कि:
> “सरोगेसी और IVF जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इस तरह की अनैतिक गतिविधियां अस्वीकार्य हैं। दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी और जरूरत पड़ी तो संबंधित क्लिनिक की मान्यता रद्द की जाएगी।”
स्वास्थ्य मंत्रालय ने संबंधित जिले के सीएमओ से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। साथ ही, IVF और सरोगेसी क्लीनिकों के रजिस्ट्रेशन और प्रक्रियाओं की समीक्षा के लिए एक विशेष जांच समिति भी गठित की गई है।
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पीड़ित परिवारों की दर्दभरी आपबीती
घोटाले की शिकार बनी कई दंपतियों की कहानियाँ दिल को झकझोर देने वाली हैं। अधिकांश दंपति वर्षों से संतान प्राप्ति की कोशिश कर रहे थे और डॉक्टर की बातों पर भरोसा कर उन्होंने अपनी जीवनभर की बचत, जमीन-जायदाद बेचकर भुगतान किया।
एक महिला ने बताया:
> “डॉक्टर ने कहा कि बच्चा बस कुछ ही हफ्तों में आपके पास होगा। हमने घर भी गिरवी रख दिया... लेकिन अब हमें न बच्चा मिला, न पैसा... बस धोखा मिला।”
एक अन्य दंपति ने कहा कि उन्हें जब बच्चा सौंपा गया, तब वे इतने भावुक हो गए कि सच्चाई जानने की कोशिश भी नहीं की। लेकिन जब अन्य पीड़ितों की कहानियाँ सुनीं, तो उन्हें भी शक हुआ और मामला खुला।
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विशेषज्ञों की राय: कमजोर नियमन प्रणाली जिम्मेदार
मेडिकल लॉ और बायोएथिक्स से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि IVF और सरोगेसी से जुड़ी प्रक्रियाएं बहुत संवेदनशील और जटिल होती हैं। भारत में “सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021” लागू है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई खामियाँ हैं।
विशेषज्ञ कहते हैं कि:
निजी क्लीनिकों में निगरानी का अभाव है
बिचौलियों पर कोई ठोस नियंत्रण नहीं
सरोगेट माताओं की पहचान और सुरक्षा को लेकर कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं
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निष्कर्ष: पारदर्शिता और जवाबदेही की सख्त ज़रूरत
IVF-सरोगेसी से जुड़ा यह घोटाला न सिर्फ चिकित्सा पेशे की नैतिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे नियमन की कमी के चलते आम लोग बड़े पैमाने पर ठगी का शिकार हो सकते हैं।
इस मामले से यह स्पष्ट है कि स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करना अब बेहद जरूरी हो गया है। सरकार और जांच एजेंसियों से उम्मीद है कि वे इस प्रकरण में दोषियों को सख्त सजा दिलाएं और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाएं।